मरुधरा कला एवं संस्कृति महा-काव्य
गीतों की लय में पिरोए गए राजस्थान जीके के सबसे कठिन और महत्वपूर्ण तथ्य। एक बार कंठस्थ करें, जीवन भर परीक्षा में बाजी मारें!
कालबेलिया जाति के चारों प्रमुख नृत्यों को हमेशा के लिए याद रखने का अचूक फॉर्मूला:
बा - बागड़िया (भीख मांगते समय)
इ - इण्डोणी (युगल नृत्य)
पा - पणिहारी (युगल नृत्य)
स - संकरिया (प्रेम कहानी आधारित)
सूत्र: "गोलू मामा मोरिया संग ज्वारा में कूदे"
गो - गोल नृत्य
लू - लूर नृत्य (रिश्ता मांगते समय)
मामा - मादल व मान्दलिया नृत्य
मोरिया - मोरिया नृत्य (विवाह पर)
ज्वारा / कूदे - ज्वारा और कूद नृत्य (बिना वाद्य के)
इन पाँच पीरों की पूजा हिंदू और मुस्लिम दोनों समान श्रद्धा भाव से करते हैं:
गो - गोगाजी चौहान
पा - पाबूजी राठौड़
मे - मेहाजी मांगलिया
ह - हड़बूजी सांखला
रा - रामदेवजी तंवर
🏺 हस्तशिल्प और मिट्टी कला
"जयपुर की ब्लू, कोटा की ब्लैक निराली, पोखरण की क्ले, अलवर की कागजी मतवाली।"
"नाथूजी प्रतापगढ़ में हरे काँच पर थेवा कला चमकाते, बालोतरा का अजरख-मलीर, आकोला का दाबू मन हर्षाते!"
"जोड़ा इसमें तारकशी का जेवर जेठ का मान बढ़ाए, उस्ता कला ऊँट की खाल पर बीकानेर चमकाए।"
"बाड़मेर का अजरख चमके, सांगानेर की छपाई प्यारी, मोलेला की मृण्मूर्ति (टेराकोटा) है जग से न्यारी!"
विशेष परीक्षा बिंदु:
- ब्लू पॉटरी: पर्शियन मूल की कला, कृपाल सिंह शेखावत ने इसे वैश्विक ख्याति दिलाई।
- कागजी पॉटरी: अलवर की दोहरे परत वाली पतली मिट्टी की कला (Double cut pottery)।
- थेवा कला: प्रतापगढ़ का प्रसिद्ध सोनी परिवार हरे काँच पर सोने की महीन नक्काशी करता है।
- मोलेला गाँव (राजसमंद): मिट्टी की मूर्तियाँ (Terracotta) बनाने के लिए विश्व प्रसिद्ध।
- तारकशी के जेवर: नाथद्वारा (राजसमंद) में चाँदी के पतले तारों से आभूषण बनाना।
🔱 लोक देवता और सिद्ध संत
"पटवों की पाँच मंजिला पत्थर की जाली गाए, गोपा मेहरा ही बस पंचपीरों में आए।"
(तेजाजी इस पावन सूची में नहीं समाए!)
"पाबूजी की फड़ सबसे चौड़ी, ऊँटों के वो रक्षक कहलाते, रामदेव जी के 'व्यावले' और 'तेरहताली' मन को भाते।"
"देवनारायण की फड़ पे जंतर बाजे, गुर्जरों के वो देव महान, जाम्भोजी के उनतीस नियम, जसनाथी करते अग्नि नृत्य की तान!"
विशेष परीक्षा बिंदु:
- पाबूजी: मारवाड़ में सर्वप्रथम ऊँट लाने का श्रेय। इनकी फड़ रावणहत्था वाद्य पर बाची जाती है।
- रामदेवजी: एकमात्र लोकदेवता जो कवि भी थे, जिन्होंने 'चौबीस वाणियाँ' ग्रंथ रचा।
- देवनारायण जी: गुर्जरों के आराध्य। इनकी फड़ पर भारतीय डाक विभाग ने टिकट जारी किया।
- जसनाथी संप्रदाय: कतरियासर (बीकानेर) में धधकते अंगारों पर 'फतेह-फतेह' कहते हुए अग्नि नृत्य।
💃 लोक नृत्य एवं नृत्य विधाएँ
"कालबेलिया का बाईपास (बागड़िया, इण्डोणी, पणहारी, संकरिया) मन मोहे, भीलों की गवरी, गैर, युद्ध और द्विचकरी सोहे।"
"हाथीमना विवाह में घुटने टेककर नाचे, गरासियों का गोलू-मामा (गोर, लूर, कूद, मांदल, मावलिया) मोरिया संग ज्वारा लाचे। कूद पड़े जब लूर में, बिना बाजे ही नाचे!"
"सहरिया का शिकारी नाचे, कत्थक का घराना जयपुर कहलाए, चरी नृत्य में फलकू बाई सिर पर चरी सजाए।"
"शेखावाटी के गीदड़, चंग और डफ़ की थाप न्यारी, बावरी जाति का धाकड़ और चकरी नृत्य लागे भारी।"
विशेष परीक्षा बिंदु:
- कालबेलिया नृत्य: वर्ष 2010 में यूनेस्को (UNESCO) की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल।
- गवरी नृत्य: भीलों का ऐतिहासिक लोकनाट्य रूपी नृत्य, जिसे 'मेरु नाट्य' भी कहा जाता है।
- चरी नृत्य: किशनगढ़ क्षेत्र का प्रसिद्ध गुर्जर महिला नृत्य। फलकू बाई इसकी मुख्य नृत्यांगना हैं।
- हाथीमना नृत्य: भील पुरुषों द्वारा विवाह के अवसर पर घुटने टेककर तलवार घुमाते हुए किया जाता है।
🎻 लोक वाद्य यंत्र
"रामा का अपंग बेटा भपंग संग जंतर बजाता, कमायचा, दुकाको, चीकारा तत (तार वाले) में गिना जाता।"
"अल्गु (अलगोजा), बांके, पूँगी, सतारा, मोरचंग सुषिर (फूँक वाले) कहावे, फूँक मार कर सुर का सुंदर तान सुनावे।"
"चंग, खंजरी, डमरू, नगाड़ा अवनद्ध (चमड़े के) की श्रेणी में आए, मंजीरा, खड़ताल, झांझ और चिमटा घन (धातु के) कहलाए।"
विशेष परीक्षा बिंदु:
- अलगोजा: राजस्थान का राज्य वाद्ययंत्र (दो बांसुरी जोड़कर बजाया जाता है)।
- भपंग: मेवात क्षेत्र का प्रमुख वाद्ययंत्र। जहूर खाँ मेवाती इसके जादूगर माने जाते हैं।
- मोरचंग: राजस्थान का 'ज्यूज़ हार्प' (Jew's Harp) कहा जाने वाला सबसे छोटा वाद्ययंत्र।
- कमायचा: मांगणियार जाति का अत्यंत सुरीला काष्ठ वाद्ययंत्र। साकर खान इसके प्रमुख वादक थे।
🎭 लोक नाट्य एवं रंगमंच
"भरतपुर के भूरीलाल संग गिरिराज नौटंकी लाए, कुचामन के लच्छीराम ओपेरा सा ख्याल गाए।"
"जयपुर के बंशीधर, गोपी संग तमाशा का अखाड़ा सजाते..."
"हेला ख्याल लालसोट का गूँजे, तुरा-कलंगी मेवाड़ में रंग जमाए, लक्षीराम और तेज कवि ने रम्मत में नए आयाम दिखाए।"
विशेष परीक्षा बिंदु:
- नौटंकी: पूर्वी राजस्थान (भरतपुर-धौलपुर) में लोकप्रिय। भूरीलाल इसके प्रणेता हैं।
- तमाशा नाट्य: जयपुर रियासत का शास्त्रीय रंगमंच रूप। गोपीकृष्ण भट्ट इसके महान कलाकार रहे।
- रम्मत: बीकानेर और जैसलमेर क्षेत्र का प्रसिद्ध काव्य नाट्य। होली पर इनका मंचन होता है।
- तेज कवि: जैसलमेर के रम्मत कलाकार जिन्होंने 'स्वतंत्र बावनी' लिखकर महात्मा गांधी को भेंट की थी।
🏰 दुर्ग, स्थापत्य एवं हवेलियाँ
"चित्तौड़गढ़ है गढ़ों का सिरमौर, बाकी सब गढ़ैया कहलाते, कुम्भलगढ़ की दीवार देख चीन वाले भी थर्राते।"
"जैसलमेर का सोनार किला बिना चूने के खड़ा शान से, मेहरानगढ़ की मयूराकृति जोधपुर में चमके मान से।"
"सालिम सिंह और नथमल की हवेली जैसलमेर की शान, शेखावाटी की भित्तिचित्र (Fresco) कला है सबसे महान!"
विशेष परीक्षा बिंदु:
- कुम्भलगढ़ दुर्ग: इसकी 36 किमी लंबी दीवार को "भारत की महान दीवार" (Great Wall of India) कहा जाता है।
- सोनार किला: पीले बलुआ पत्थरों से निर्मित होने के कारण सूर्य की धूप में सोने की तरह चमकता है।
- मेहरानगढ़: चिड़ियाटूँक पहाड़ी पर निर्मित। इसे 'मयूरध्वजगढ़' भी कहा जाता है।
- शेखावाटी की हवेलियाँ: इन्हें "ओपन एयर आर्ट गैलरी" (Open Air Art Gallery) कहा जाता है।
🖌️ राजस्थान की चित्रकला शैलियाँ
"किशनगढ़ की बणी-ठणी को भारत की मोनालिसा कहते, निहालचंद के रंगों में सावन सिंह (नागरीदास) बहते।"
"मेवाड़ शैली में कलीला-दमना के किस्से दर्शाए, कोटा शैली में नारी भी शिकार करती नजर आए।"
🎨 किशनगढ़ स्कूल (स्वर्ण काल):
- बणी-ठणी: राजा सावंत सिंह की प्रेमिका का चित्र जिसे 'एरिक डिकिंसन' ने 'भारत की मोनालिसा' कहा।
- मुख्य चित्रकार: मोरध्वज निहालचंद। आँखों का आकार खंजनाकृति (तीखी और लंबी) होना मुख्य विशेषता है।
🎨 कोटा एवं मेवाड़ शैलियाँ:
- कोटा शैली: शिकार के दृश्यों की बहुलता। यहाँ रानियों एवं नारियों को भी आखेट करते दिखाया गया है।
- कलीला-दमना: मेवाड़ चित्रशैली के अंतर्गत 'पंचतंत्र' कहानी के दो गीदड़ पात्रों का अद्भुत चित्रण।
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