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5. रीतिकाल (उत्तर मध्यकाल): संवत 1700 से 1900 (1643 ई. से 1843 ई.)

रीतिकाल को हिंदी साहित्य का 'कला काल' (डॉ. रमाशंकर शुक्ल 'रसाल' के अनुसार) या 'शृंगार काल' (पंडित विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के अनुसार) कहा जाता है। 'रीति' शब्द का संस्कृत में अर्थ 'विशिष्ट पद रचना' (काव्यांग लक्षण) है। इस काल में कवियों ने राजाओं को प्रसन्न करने और चमत्कार प्रदर्शन के लिए लक्षण-ग्रंथों और शृंगारिक काव्यों की रचना की।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने रीतिकाल को मुख्य रूप से तीन धाराओं में विभाजित किया है, जो परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण वर्गीकरण है:

क) रीतिकाल का वर्गीकरण एवं प्रमुख धाराएँ

                              रीतिकाल
                                 |
         ---------------------------------------------------
         |                       |                         |
     रीतिबद्ध                रीतिसिद्ध                 रीतिमुक्त

1. रीतिबद्ध धारा

  • परिभाषा: वे कवि जिन्होंने शास्त्रीय ढंग पर लक्षण-ग्रंथों की रचना की। यानी पहले दोहे में रस, अलंकार या छंद के 'लक्षण' (नियम) लिखे और फिर कवित्त या सवैया में उसका 'उदाहरण' दिया।
  • प्रमुख कवि: केशवदास (रीतिकाल के प्रवर्तक - डॉ. नगेंद्र के अनुसार), चिंतामणि (प्रवर्तक - आचार्य शुक्ल के अनुसार), मतिराम, देव, पद्माकर, भिखारीदास।
  • विशेषता: आचार्यत्व का प्रदर्शन, संस्कृत काव्यशास्त्र का अंधानुकरण, ब्रजभाषा का प्रौढ़ रूप।

2. रीतिसिद्ध धारा

  • परिभाषा: वे कवि जिन्होंने लक्षण-ग्रंथ तो नहीं लिखे, लेकिन काव्यशास्त्र के नियमों (रीति) की उन्हें पूरी जानकारी थी। उनकी रचनाएँ स्वतः ही रीति के सांचे में ढली हुई थीं।
  • प्रमुख कवि: बिहारीलाल (इस धारा के एकमात्र और सर्वश्रेष्ठ प्रतिनिधि कवि)।
  • विशेषता: गागर में सागर भरने की कला, बिम्ब योजना, अनुभाव विधान, ज्योतिष, गणित और आयुर्वेद का ज्ञान।

3. रीतिमुक्त धारा

  • परिभाषा: वे कवि जिन्होंने दरबार में रहते हुए भी शास्त्रीय बंधनों (लक्षण-उदाहरण पद्धति) को पूरी तरह तोड़ दिया और अपने हृदय की स्वच्छंद और स्वाभाविक अनुभूतियों को लिखा। इसे 'स्वच्छंदतावादी धारा' भी कहते हैं।
  • प्रमुख कवि: घनानंद (सर्वश्रेष्ठ), बोधा, आलम, ठाकुर, द्विजदेव।
  • विशेषता: आंतरिक विरह की प्रधानता, वासनामुक्त प्रेम, पीर की कसक, दरबारी संस्कृति से विद्रोह।

ख) प्रमुख ग्रंथ, कवि और आश्रयदाता (परीक्षा मिलान चार्ट)

कवि का नामप्रसिद्ध ग्रंथमुख्य आश्रयदाता राजापरीक्षा का विशेष तथ्य
केशवदासरामचंद्रिका, कविप्रियाओरछा नरेश इंद्रजीत सिंहशुक्ल जी ने इन्हें 'कठिन काव्य का प्रेत' कहा है। रामचंद्रिका को छंदों का अजायबघर कहा जाता है।
बिहारीलालबिहारी सतसईजयपुर नरेश मिर्जा राजा जयसिंहमात्र 713 दोहों के इस ग्रंथ पर 'आर्यसप्तशती' और 'गाथासप्तशती' का प्रभाव है।
घनानंदसुजान हित, इश्कलतामोहम्मदशाह रंगीले (मीरमुंशी)ये अपनी प्रेमिका 'सुजान' (नर्तकी) के विरह में तड़पकर कृष्णभक्त बने। इन्हें 'साक्षात रसमूर्ति' कहा जाता है।
भूषणशिवराज भूषण, छत्रसाल दशकछत्रपति शिवाजी, राजा छत्रसालरीतिकाल के एकमात्र राष्ट्रकवि जिन्होंने शृंगार के बजाय 'वीर रस' में ओजपूर्ण काव्य लिखा।
पद्वमाकरजगतविनोद, पद्माभरणजयपुर नरेश जगतसिंहइन्हें रीतिकाल का 'अंतिम प्रसिद्ध कवि' माना जाता है।

🎨 रीतिकाल को याद रखने की 'काव्य ट्रिक'

काव्य ट्रिक: केशव कठिन काव्य के प्रेत, लक्षण-ग्रंथ बनाए। चिंतामणि और देव ने, रीतिबद्ध सजाए॥ एक अकेले बिहारी ने, सतसैया रस घोल्या। घनानंद और बोधा ने, मुक्त प्रेम-पट खोल्या॥ भूषण ने हुंकार भरी, तज शृंगार की रीत। शिवा-छत्रसाल शौर्य गा, जीती जग की प्रीत॥

ग) महत्वपूर्ण परीक्षा-ोपयोगी सूक्तियाँ और पंक्तियाँ

बिहारीलाल: "सतसैया के दोहरे, ज्यों नाविक के तीर। देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर।" (यह पंक्ति बिहारी की प्रशंसा में कही गई है) "कनक कनक ते सौ गुनी, मादकता अधिकाय। उहि खाए बौराए जग, इहि पाए बौराए॥" (यमक अलंकार और नीति का बेजोड़ दोहा)

घनानंद (रीतिमुक्त प्रेम की परिभाषा): "अति सूधो सनेह को मारग है, जहाँ नेकु सयानप बांक नहीं। तहाँ साँचे चलें तजि आपुनपो, झझकें कपटी जे निसांक नहीं॥" (बेहद महत्वपूर्ण)

बोधा: "यह प्रेम को पंथ कराल महा, तरवारि की धार पै धावनो है।" (घनानंद के पूरक के रूप में पूछी जाने वाली पंक्ति)

भूषण (वीर रस): "साजि चतुरंग बीररंग में तुरंग चढ़ि, सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत है।"

पद्माकर (होली वर्णन): "गुलगुली गिलमैं गलीचा हैं गुनीजन हैं, चांदनी हैं चिक हैं चिरागन की माला हैं।"

🎯 रीतिकाल का 'एग्जाम ट्रैप'

  1. प्रवर्तक का विवाद: यदि प्रश्न आए कि "कालक्रम की दृष्टि से रीतिकाल के प्रवर्तक कौन हैं?" तो उत्तर केशवदास (1555 ई.) होगा। लेकिन यदि पूछे कि "अखंड परंपरा और प्रवृत्तियों के आधार पर शुक्ल जी किसे मानते हैं?" तो उत्तर चिंतामणि (1609 ई.) होगा।
  2. भूषण का रस अपवाद: रीतिकाल की मुख्य प्रवृत्ति 'शृंगार' है, लेकिन महाकवि भूषण इस काल के सबसे बड़े अपवाद हैं, जिन्होंने वीर रस को अपना मुख्य विषय बनाया। परीक्षा में अक्सर रीतिकाल के वीर रस के कवि के रूप में इनका नाम पूछा जाता है।
  3. सुजान शब्द का जाल: घनानंद के काव्य में 'सुजान' शब्द के दो अर्थ हैं—लौकिक पक्ष में उनकी प्रेमिका (नर्तकी) और अलौकिक पक्ष में 'श्रीकृष्ण'। संदर्भ के अनुसार उत्तर चुनें।

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