3. आदिकाल (वीरगाथा काल) — संवत 1050 से 1375 (993 ई. से 1318 ई.)
हिंदी साहित्य का शुरुआती कालखंड 'आदिकाल' के नाम से जाना जाता है। यह काल राजनीतिक दृष्टि से युद्धों और अशांति का काल था, तो साहित्यिक दृष्टि से इसमें धार्मिक, वीर रसात्मक और शृंगारिक रचनाओं का अनूठा मिश्रण देखने को मिलता है।
1. आदिकाल की प्रमुख काव्य-धाराएँ (वर्गीकरण)
आदिकालीन साहित्य को मुख्य रूप से 6 भागों में बाँटा गया है:
क) सिद्ध साहित्य
- परिचय: बौद्ध धर्म के 'वज्रयान' तत्व का प्रचार करने के लिए जो साहित्य लिखा गया, वह सिद्ध साहित्य कहलाया। इनकी संख्या 84 मानी गई है।
- भाषा/शिल्प: संधा (सन्ध्या) भाषा शैली। इसमें अंतःसाधनात्मक अनुभूतियों को प्रतीकों में व्यक्त किया गया।
- प्रमुख कवि: सरहपा (हिंदी के प्रथम कवि, रचना: दोहाकोश), शबरपा, लुइपा (सिद्धों में सबसे ऊँचा स्थान)।
ख) नाथ साहित्य
- परिचय: सिद्धों की वाममार्गी भोग-प्रधान साधना के विरोध में राहुल संकृत्यायन के अनुसार नाथ पंथ खड़ा हुआ। इन्होंने 'हठयोग' (ह = सूर्य, ठ = चंद्र) और इंद्रिय निग्रह पर बल दिया। नाथों की संख्या 9 है।
- प्रमुख कवि: गोरखनाथ (नाथ साहित्य के आरंभकर्ता)। मिश्र बंधुओं ने इन्हें 'हिंदी का प्रथम गद्य लेखक' माना है।
ग) जैन साहित्य (रास काव्य)
- परिचय: पश्चिमी भारत (गुजरात, राजपूताना) में जैन साधुओं द्वारा अपने धर्म के प्रचार हेतु लिखा गया साहित्य। यह आदिकाल का सबसे प्रामाणिक साहित्य माना जाता है।
- शिल्प: 'रास' शैली (नृत्य-काव्य)।
- प्रमुख कवि/रचनाएँ:
- स्वयंभू — पउम चरिउ (इसे 'अपभ्रंश का रामायण' कहते हैं, स्वयंभू को अपभ्रंश का वाल्मीकि कहा जाता है)।
- शालिभद्र सूरि — भरतेश्वर बाहुबली रास (1184 ई.)।
- देवसेन — श्रावकाचार (933 ई. - इसे हिंदी की प्रथम पुस्तक माना जाता है)।
घ) रासो साहित्य (वीरगाथा काव्य)
- परिचय: राजाओं के आश्रित चारण और भाट कवियों द्वारा रचित वीरता और शृंगार से युक्त काव्य। इसकी प्रामाणिकता पर सबसे ज्यादा विवाद है।
- भाषा/शिल्प: डिंगल (अपभ्रंश + राजस्थानी = कर्कश/वीर रस हेतु) और पिंगल (अपभ्रंश + ब्रज = कोमल/शृंगार रस हेतु) शैली।
- प्रमुख रचनाएँ:
- पृथ्वीराज रासो (चन्दबरदाई): हिंदी का प्रथम महाकाव्य। आचार्य शुक्ल ने चन्दबरदाई को हिंदी का प्रथम महाकवि माना है। यह 69 सर्गों (समय) में विभाजित है।
- बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह): यह वीरकाव्य नहीं, बल्कि एक शृंगारिक गीति-काव्य है। इसमें राजमती और बीसलदेव के विरह-मिलन की कथा है। हिंदी में सर्वप्रथम 'बारहमासा' (ऋतु वर्णन) का वर्णन इसी ग्रंथ में मिलता है।
- परमाल रासो (जगनिक): इसे 'आल्हाखण्ड' भी कहते हैं। इसमें महोबा के वीर आल्हा और ऊदल के युद्धों का ओजपूर्ण वर्णन है। (यह वर्षा ऋतु में गाया जाता है)।
- खुमाण रासो (दलपति विजय), हम्मीर रासो (शार्ंगधर)।
ङ) लौकिक साहित्य
- परिचय: धार्मिक और राजाश्रित सीमाओं से मुक्त, आम जनता के मनोरंजन और लोक-रंजन के लिए लिखा गया काव्य।
- प्रमुख रचनाएँ:
- ढोला मारू रा दूहा (कुशललाभ/कल्लोल कवि) — राजस्थान का प्रसिद्ध प्रेम काव्य।
- वसन्त विलास (अज्ञात कवि) — इसमें वसंत और स्त्रियों पर उसके विलासपूर्ण प्रभाव का अनूठा चित्रण है।
च) गद्य और चम्पू काव्य (गद्य-पद्य मिश्रित)
- राउलवेल (रोडा कवि — 10वीं सदी): यह एक शिलांकित कृति (पत्थर पर खुदी हुई) है। इसमें हिंदी साहित्य में सर्वप्रथम 'नख-शिख वर्णन' की परंपरा शुरू हुई। यह चम्पू काव्य है।
- उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण (दामोदर शर्मा): यह एक प्रसिद्ध व्याकरण ग्रंथ है।
- वर्ण रत्नाकर (ज्योतिरीश्वर ठाकुर): मैथिली भाषा का गद्य कोष / विश्वकोश।
2. आदिकाल के दो 'अनोखे' सितारे (विशिष्ट कवि)
1. अमीर खुसरो (खड़ीबोली के प्रथम कवि)
- उपाधि: 'तोता-ए-हिन्द' (खसरो ने स्वयं को कहा)। वास्तविक नाम: अबुल हसन।
- साहित्यिक योगदान: इन्होंने पहेलियाँ, मुकरियाँ, दो सखुने और गज़लें लिखीं।
- परीक्षा तथ्य: आज की काव्य भाषा खड़ीबोली के आदि-कवि अमीर खुसरो ही हैं। ये निजामुद्दीन औलिया के शिष्य थे।
- प्रसिद्ध पंक्ति: "गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस। चल खुसरो घर आपने, रैन भई चौदेस॥" (औलिया की मृत्यु पर)।
2. विद्यापति (मैथिल कोकिल)
- उपाधियाँ: मैथिल कोकिल, अभिनव जयदेव, कविशेखर।
- रचनाएँ: पदावली (मैथिली भाषा में - शृंगारिक पद), कीर्तिलता और कीर्तिपताका (अवहट्ट भाषा में)।
- परीक्षा तथ्य: इनकी 'पदावली' के शृंगारिक पदों को देखकर सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने कहा था कि—"पदावली के पद नागिन की लहर हैं।"
3. आदिकाल की प्रमुख प्रवृत्तियाँ (विशेषताएँ)
- आश्रयदाताओं की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा: कवि राजाओं को प्रसन्न करने के लिए उनके युद्धों और प्रेम का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन करते थे।
- ऐतिहासिकता का अभाव: तिथियाँ और घटनाएँ इतिहास से मेल नहीं खातीं (काल्पनिक अधिक हैं)।
- युद्ध और शृंगार का समन्वय: "एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में कंगन" जैसी स्थिति थी। युद्धों का मूल कारण अक्सर कोई सुंदर राजकुमारी होती थी।
- राष्ट्रीयता का अभाव: देश का मतलब पूरा भारत नहीं, बल्कि अपनी छोटी सी रियासत (जैसे 20-50 गाँव) था।
- डिंगल-पिंगल भाषाओं का प्रयोग।
🎨 आदिकाल याद रखने की 'शॉर्टकट ट्रिक'
काव्य ट्रिक: चन्दबरदाई ने रचा, पृथ्वीराज महान। जगनिक आल्हा गा रहे, वर्षा ऋतु की तान॥ विद्यापति मैथिल बने, खुसरो खड़ी जुबान। रासो, सिद्ध और नाथ मिल, आदिकाल की शान॥
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