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*केकड़ी (कनकावती/कंकवती/कनकवती) नगर का सामान्य परिचय*

 *केकड़ी (कनकावती/कंकवती/कनकवती) नगर का सामान्य परिचय* 

संकलनकर्ता:- दिनेश कुमार कीर

केकड़ी कनकावती नगरी राजस्थान के हृदय स्थल अजमेर जिले में जिला मुख्यालय से 80 किमी दूर पर वैभवशाली ऐतिहासिक एवं प्राचीन नगरी कनकावती स्थित है । जो की हाल ही में जिला बनाने के लिए घोषणा की जा चुकी है, इसको वर्तमान में यहां के चमत्कारिक केकड़ाधीस बालाजी धाम के नाम से केकड़ी नगर के नाम से जाना जाता है । ऐसी मान्यता है कि इस शहर का नामकरण के चौहान 'गुर्जर' जाति के मुखिया की अत्यंत रूपवती पुत्री कनकावती के नाम पर हुआ । जिसने मुगल शासक सुबुक्तगीन की कुदृष्टि से अपने सतीत्व की रक्षा के लिए अग्निस्नान कर आत्मोत्सर्ग कर लिया आज भी चारभुजा मंदिर के पीछे सती कनकावती का मंदिर स्थित है । 

चौहान 'गुर्जरों' व बड़ाक 'जाटों' की संयुक्त सेना और मुगल सेना में घमासान युद्ध हुआ इस युद्ध में सुबुक्तगीन की पराजय हुई ।

केकड़ी कस्बे की स्थापना सन् 884 ई.में हुई थी यहां धीरे-धीरे चौहान, नायक, पंसारी, बलाई, खटीक, जाट एवं विजयवर्गीय आदि समाज के लोग आस-पास के गांवों से आकर बसना शुरू हुए । यहां चौहान, सिसोदिया, राठौड़, मुगल, सिंधिया, मराठा, इत्यादि के वंशजों द्वारा समय-समय पर शासन किया गया ।

केकड़ी को प्राचीन काल मे कनकावती नगरी के नाम से जाने-जाते थे । वर्तमान में इस कस्बे का नाम कनकावती से केकड़ी हो गया ।

 केकड़ी कस्बा दो चरणों में विकसित हुआ है जो कि मुख्य रूप से प्राचीन केकड़ी एवं नई केकड़ी के नाम से जानते हैं । पुरानी केकड़ी मराठा शासकों द्वारा व नई केकड़ी कर्नल डिक्सन तत्कालीन राज्यपाल द्वारा वर्ष 1840 ई. में बसाया गया । वर्ष 1901ई. में तत्कालीन राज्यपाल ब्रिगेडियर मीर द्वारा कस्बे में मीर दरवाजा एवं मीर तालाब का निर्माण करवाया गया । यहां वर्ष 1908 ई. में महिला चिकित्सालय, कबूतरखाना, डाक बंगला व निकेतन स्कूल इत्यादि का निर्माण करवाया गया तथा वर्ष 1928 ई. में टाउन हॉल का निर्माण करवाया गया । केकड़ी कस्बे में वर्ष 1929 ई. में नगर पालिका की स्थापना हुई, वर्ष 1937 ई. में तहसील कार्यालय एवं मुंसिफ कोर्ट रायसर से केकड़ी स्थानांतरित किया गया ।

 केकड़ी कस्बे में "अ" श्रेणी की कृषि मंडी स्थित है ।

वर्ष 1192 ई. तक केकड़ी पर चौहान राजपूतों का आधिपत्य रहा । वर्ष 1200 ई. पश्चात पृथ्वीराज चौहान द्वारा केकड़ी को अपने साले विधराज भोज को उपहार स्वरूप प्रदान ...

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