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आपसी सदभावना और मेल मिलाप के साथ मनाये जाने वाले होली पर्व के पहले होलिका दहन की परंपरा है। हमारे पर्व त्योहार केवल परम्परा ही नही है बल्कि वैज्ञानिकता की दृष्टि से भी प्रामाणिक है।

 आपसी सदभावना और मेल मिलाप के साथ मनाये जाने वाले होली पर्व के पहले होलिका दहन की परंपरा है। हमारे पर्व त्योहार केवल परम्परा ही नही है  बल्कि वैज्ञानिकता की दृष्टि से भी प्रामाणिक है।



 होलिका दहन के साथ नष्ट हो जाते हैं बैक्टीरिया


होली पर्व पर होलिका दहन की परंपरा रही है जिसका निर्वहन पूरे श्रद्धाभाव के साथ किया जाता है। होलिका दहन वाले दिन सुबह के समय महिलाएं होलिका पूजन करती हैं। होलिका में गोबर से बनाये गये कंडों के साथ कई तरह की पूजन सामग्री भी अर्पित की जाती है। शाम के समय जब होलिका दहन किया जाता है तो जलती होलिका का तापमान लगभग 145 डिग्री फारेनहाइट तक बढ़ जाता है। अरंडी के पौधे, गोबर के कंडे और पूजन सामग्री के साथ इतने अधिक तापमान में जलती होलिका अपनी परिक्रमा करते लोगों के शरीर और आसपास के वातावरण से बैक्टीरिया को समाप्त कर देते हैं। शरद ऋतु की समाप्ति और बसंत ऋतु के आगमन का यह काल होलिका दहन करने से सर्दी के मौसम में विकसित हुए बैक्टीरिया को नष्ट कर शरीर और वातावरण को शुद्ध बनाता है।


होलिका रखते समय उसको अरंडी के पौधे से सजाया जाता है। अरंडी का पौधा बेहद गुणकारी होता है और बैक्टीरिया का नाश कर वातावरण को शुद्ध करता है। होलिका दहन के दौरान अरंडी का पौधा, उसके फल और बीज संक्रामक रोगोें के कीटाणुओं का नाश करने के साथ त्वचा को नुकसान पहुंचाने वाले जम्र्स को भी समाप्त कर देते हैं। वहीं पूजन में प्रयोग आने वाला कपूर,कंडे, नारियल और अन्य पूजन सामग्री, चिकन पाॅक्स सहित अनेक बीमारियों के वायरस को समाप्त कर देते हैैं। होलिका दहन के समय निकलने वाला धुआं मच्छरों के लार्वा को नष्ट करता है। वहीं होलिका दहन से हवा में मौजूद बैक्टीरिया भी समाप्त हो जाते हैं।

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